भक्त और भगवान


 

                          


भगवान का ऐसा है कि वे आदतन दयालु हैं । एक बार कोई ठीक से भक्ति का डेबिट कार्ड बना ले तो उसके लिए भगवान एटीएम हो जाते हैं । कथाओं से पता चलता है कि भगवान अक्सर प्रसन्न हो कर प्रकट होते हैं और भक्त से पूछते हैं कि – “मांगो वत्स, क्या मांगते हो । तुम्हारी हर इच्छा पूरी होगी । मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ” । कुछ ऐसा ही हाल के दिनों में हुआ । भगवान एक भक्त की चपेट में आ  गए । भगवान का कहना भर था कि – “मांगो वत्स ....” । वत्स ने लेपटॉप खोल कर अपनी इच्छाओं कि ई फाइल खोल कर दिखा दी ।

“इतनी इच्छाएँ !! “ भगवान के होश उड़ते उड़ते बचे ।

“तो !? ... देखिए आप भगवान हैं और स्वर्ग के सोलो-ऑनर । आपके लिए कुछ भी असंभव नहीं है । आप दरिद्रों से भले ही कोरे वादे करते हों पर मैं आपका एक जरूरी भक्त हूँ । जब खास अवसरों पर आप नगर भ्रमण पर निकलते हैं तो मेरे डोले पर ही सवार रहते हैं । आपके नाम पर भोजन-भंडारे मेरे कारण होते हैं । आपकी कीर्ति के लिए कथा-कीर्तन मैं करवाता हूँ । आप अपना सोने का सिंहासन देखिए, कितना सुंदर और भव्य बना है । जानते ही होंगे किसने बनवाया है । आप कहाँ थे और कहाँ पहुँच गए प्रभु !”  वत्स प्रभु पर हावी हुआ ।

“वत्स क्या तुम मुझे लज्जित करने का इरादा लिए हुए हो ! जरा याद करो, तुम भी कहाँ थे और कहाँ पहुँच गए  हो ! यह मत भूलो कि मेरी कृपा नहीं होती तो एमबीए के बाद कहीं पकौड़ा तल रहे होते वो भी नाले की गैस से ।“ प्रभु ने वत्स की पकड़ से अपने को छुड़ाया ।

“भक्त और भगवान के आचरण अलिखित संविदा से बंधे होते हैं प्रभु । मुझे आपकी महिमा में वृद्धि करना है, ये कर्तव्य है मेरा । और बदले में आपको कृपा पूर्वक मेरी श्री वृद्धि करना है ... बिना सोचे । बताइये इसमें नया क्या है ?”

“तुम्हारी बात ठीक है, इसीलिए तो तुम्हारे तप से प्रसन्न हो कर मैंने मांगने को कहा था ....”

“बता तो रहा हूँ, ये मेरी एक फाइल इच्छा .....”

“एक फाइल इच्छा !! ... इसमें दो हजार पेज हैं !! इतनी इच्छाएँ होती हैं किसी की !! मेरे यहाँ देर है पर अंधेर नहीं ... वो भी इतनी !! ना ।”

“तीन किलो मीटर चुनरी यात्रा कारवाई थी इस बार । तीन किलोमीटर चुनर होती है किसी की ?! जब इधर अंधेर चल सकता है तो उधर क्यों नहीं ?”

प्रभु के पास उत्तर का संकट पैदा हो गया । एक बार भस्मासुर ने उन्हें दिक्कत में डाल दिया था । बोले – “तुम ऐसा करो वत्स, इस फाइल को मेल कर दो मुझे । देवी के साथ परामर्श करके ही मैं तथास्तु बोल सकूँगा । यू नो बेटर, अब पहले वाली बात स्वर्ग में भी नहीं है । ... पूछना पड़ता है ।“

“मुझे पता था । लीजिए मैं पेन ड्राइव में भी फाइल लाया हूँ । देख लीजिए दिखा लीजिए । लेकिन ना मत कीजिए । पहले बता दे रहा हूँ । “

प्रभु ने देवी के सामने वत्स की इच्छा फाइल खोली तो उन्होने आँखें तरेर कर पूछा “इतनी इच्छाएँ होती हैं क्या किसी की !?

“आजकल के भक्तों की होती हैं । समय बादल गया है देवी, मोटा खाने और मोटा पहनने वाले अब हमारे भक्त नहीं रहे, सब आधुनिक हो गए हैं । वे अब मुझसे नहीं सरकार से मांगते  हैं ।“

“सरकार दे देती है क्या उन्हें !?”  देवी ने मुद्दे की बात पूछी ।

“देना तो छोड़ो सरकार उनकी सुनती भी नहीं है ।“

“तो स्वामी, इसका मतलब है कि तुममें और सरकार में कोई फर्क नहीं है ?”

“फर्क है देवी । वे लोग भले ही सत्ता में हों लेकिन देश तो मेरे भरोसे ही चलता है । भरोसा बहुत बड़ी चीज होती है । अगर भरोसा नहीं हो तो संसार के नब्बे प्रतिशत काम ठप्प पड़ जाएँ । ... किन्तु चिंता ये है देवी, भक्त लोग पूजा पाठ करके इसका मुआवजा मांग रहे हैं ।“

“स्वामी, मुझे तो लगता है कि ये भक्त नहीं भक्त-माफिया हैं । मेरी मानो तो इनसे बच कर रहो ।“ देवी ने निर्णय सुनाया ।

“बचना इतना आसान नहीं है देवी । मंदिर यही लोग बनवाते हैं । “

“कैसे प्रभु हैं आप !! इतना भी नहीं समझते ! ये लोग मंदिर कम सरकारें ज्यादा बनवाते हैं ।“ प्रभु के भोलेपन पर देवी को गुस्सा आया ।

“बनवाते होंगे, इससे हमें क्या । हमारा वर्कलोड ही कम होता है । बताओ जिन्हें सातवाँ वेतन मान मिल गया है क्या अब वे हमसे कुछ मांगने आते हैं ? वरना जिसे देखो सिर झुकाये चला आ रहा है ये देदो, वो देदो !!

“लेकिन ये केस कम भक्ति में ज्यादा इच्छाएँ रखने का है ! वहाँ धरती पर, आय से ज्यादा संपत्ति का पता चलता है तो जेल हो जाती है ।  .... दो हजार पेज ! और हर पेज पर इच्छाएं बेशुमार ! “

“तो फिर क्या करूँ ? मना कर दूँ ?”

“मना मत करो .... तथास्तु की जगह कह दो तुम जियो हजारो साल, साल के दिन हों पचास हजार । हिसाब बराबर ।“

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